भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी: प्रवृत्तियाँ, चुनौतियाँ और संभावनाएँ

 

Raj Kumar Singh

Asst. Professor (Department of Sociology), Kalicharan P.G. College, Lucknow, Uttar Pradesh, India.

*Corresponding Author E-mail: rajeshsinghgrand@gmail.com

 

ABSTRACT:

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का इतिहास उतार.चढ़ाव भरा रहा है। वैदिक काल में महिलाएँ राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक मामलों में सक्रिय रूप से भाग लेती थीं, लेकिन उत्तरवैदिक काल में स्मृतियों के आगमन के साथ उनकी स्थिति में गिरावट आने लगी। मध्यकालीन भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी काफी हद तक प्रतिबंधित हो गई, हालाँकि रजिया सुल्तान, रानी रुद्रमा देवी और अहिल्याबाई होलकर जैसी अपवादस्वरूप महिलाएँ शासन में आईं। औपनिवेशिक काल में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान महिलाओं की राजनीतिक चेतना और संगठनशक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। स्वतंत्रता के बाद, भारतीय संविधान ने महिलाओं को राजनीतिक समानता का अधिकार प्रदान किया, लेकिन उच्च निर्णयन स्तरों पर उनकी उपस्थिति अत्यंत सीमित रही। 1993 के 73वें और 74वें संशोधनों ने पंचायती राज संस्थाओं में 33% आरक्षण लागू कर महिलाओं की भागीदारी में महत्वपूर्ण वृद्धि की, फिर भी संसद और विधानसभाओं में उनका प्रतिनिधित्व आज भी केवल 14% और 9% के आसपास है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण में रवांडा (63.75%), नॉर्डिक देशों (44.46%) और दक्षिण अफ्रीका (43%) से काफी पीछे है।

 

यह शोध आलेख ऐतिहासिक और समकालीन परिप्रेक्ष्य में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का विश्लेषण करता है। अध्ययन में वैदिक, उत्तरवैदिक, मध्यकालीन, औपनिवेशिक और स्वतंत्रता-उत्तर काल का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। साथ ही, समकालीन भारत में महिलाओं की भागीदारी की प्रवृत्तियों, बाधाओं तथा संभावनाओं का आलोचनात्मक परीक्षण किया गया है। अध्ययन में यह पाया गया कि संवैधानिक प्रावधानों और नीतिगत हस्तक्षेपों के बावजूद संरचनात्मक असमानताएँ अभी भी महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सीमित करती हैं।

 

KEYWORDS: महिला राजनीतिक भागीदारी, भारतीय राजनीति, लैंगिक आरक्षण, पंचायती राज, नारी शक्ति वंदन अधिनियम, अंतरराष्ट्रीय तुलना

 

 

 


1. प्रस्तावना:

लोकतंत्र की सार्थकता ‘समावेशिता’ में निहित है। भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी केवल संख्यात्मक उपस्थिति का विषय नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक न्याय की आधारशिला है जिसका स्वप्न भारतीय संविधान के निर्माताओं ने देखा था। महिलाएँ भारत की लगभग 49 प्रतिशत जनसंख्या का गठन करती हैं, फिर भी निर्णयन प्रक्रियाओं में उनकी उपस्थिति अत्यंत सीमित रही है। अरस्तू से लेकर समकालीन विचारकों तक, राजनीति को ‘सार्वजनिक कल्याण’ का साधन माना गया है और जब तक आधी आबादी इस साधन से दूर है, तब तक ‘कल्याण’ की अवधारणा अधूरी है। यह शोध आलेख भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के विभिन्न आयामों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जिसमें वैदिक काल से लेकर वर्तमान के श्नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023)’ तक की ऐतिहासिक प्रवृत्तियों, वैश्विक तुलनात्मक विश्लेषण और विद्वानों के सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्यों को सम्मिलित किया गया है।

 

यह अध्ययन मुख्यतः गुणात्मक पद्धति पर आधारित है। इसमें मुख्यतः द्वितीयक स्रोतों ऐतिहासिक दस्तावेजों, शोध-पत्रों तथा नारीवादी साहित्य का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन में ऐतिहासिक-व्याख्यात्मक दृष्टिकोण का उपयोग करते हुए विभिन्न कालखंडों में महिलाओं की राजनीतिक स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।

 

2. ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ (वैदिक काल से स्वतंत्रता तक):

ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो भारतीय सभ्यता के प्रारंभिक काल, विशेषकर ऋग्वैदिक काल में, महिलाएँ समाज के सभी क्षेत्रों में पुरुषों के समान स्थिति और अधिकारों का आनंद लेती थीं। प्राचीन ग्रंथों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ न केवल शिक्षित थीं, बल्कि वे ‘सभा’ और ‘समिति’ जैसी महत्वपूर्ण राजनीतिक संस्थाओं में सक्रिय रूप से भाग लेती थीं। यजुर्वेद (13/18) में स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि राजा के समान नारियों की भी राजकार्य में सहभागिता होती थी और न्याय व्यवस्था में भी वे समानरूप से भाग ले सकती थीं (भारतीय परम्परा में नारी सशक्तिकरण वैदिक एवं, 2018)। डॉ. ए.एस. अल्तेकर जैसे विद्वान तर्क देते हैं कि वैदिक काल में नारी को ‘साध्वी’ और ‘विदुषी’ के रूप में देखा जाता था, जहाँ उनके राजनीतिक विचारों को महत्व दिया जाता था (अल्तेकर, 1956) गार्गी और मैत्रेयी जैसे उदाहरण केवल दार्शनिक ज्ञान तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे तत्कालीन शासन के नैतिक और सामाजिक ढांचे को प्रभावित करने की क्षमता रखती थीं। (वैदिक काल में नारी की स्थिति का ऐतिहासिक अध्ययनए 2013)।

 

हालांकि, उत्तर-वैदिक काल (1000 ई.पू. 600 ई.पू.) के आगमन के साथ इस स्थिति में स्पष्ट गिरावट देखी गई। जैसे-जैसे कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में भूमि के स्वामित्व का महत्व बढ़ा, महिलाओं की गतिशीलता पर अंकुश लगाया जाने लगा। ऐतरेय ब्राह्मण जैसे परवर्ती ग्रंथों में पुत्री के जन्म को दुखों का कारण बताया जाने लगा और धीरे-धीरे उन्हें सार्वजनिक जीवन से अलग कर घरेलू कार्यों तक सीमित कर दिया गया। यह वह दौर था जब राजनीति का स्वरूप ‘लोकतांत्रिक’ से हटकर ‘वंशानुगत’ और ‘सैन्य’ होता गया, जिसमें महिलाओं की भूमिका गौण कर दी गई।

 

मध्यकालीन भारत का इतिहास महिलाओं के लिए विरोधाभासों से भरा रहा है। एक ओर पर्दा प्रथा, सती प्रथा और बाल विवाह जैसी कुरीतियों ने महिलाओं को सार्वजनिक जीवन और सत्ता के गलियारों से पूरी तरह अदृश्य कर दिया, वहीं दूसरी ओर कुछ असाधारण महिलाओं ने इन बेड़ियों को तोड़कर शासन की कमान संभाली। रजिया सुल्तान का शासनकाल भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु है; उन्होंने लिंग के आधार पर अयोग्यता के रूढ़िवादी दावों को खारिज करते हुए अपनी प्रशासनिक और सैन्य कुशलता का परिचय दिया। इसी प्रकार, दक्षिण भारत में और मराठा शासन के दौरान अहिल्याबाई होल्कर ने प्रशासन का एक मानवीय और न्यायपूर्ण मॉडल प्रस्तुत किया। अहिल्याबाई ने न केवल आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित की बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भी अपना लोहा मनवाया। हालांकि, ये उदाहरण अपवाद ही रहे। समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो मध्यकाल में राजनीति ‘बाहुबल’ और ‘रक्त-संबंधों’ पर आधारित हो गई थी, जिससे आम महिलाओं के लिए राजनीतिक भागीदारी के द्वार लगभग बंद थे। सामंती व्यवस्था ने महिलाओं को केवल राजनीतिक संधियों के माध्यम से विवाह तक सीमित कर दिया था, जहाँ उन्हें स्वायत्त नेतृत्व के बजाय साधन के रूप में उपयोग किया गया।

 

19वीं और 20वीं शताब्दी के ब्रिटिश शासनकाल (औपनिवेशिक काल) ने भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को एक नया वैचारिक आधार प्रदान किया। पाश्चात्य शिक्षा और समाज सुधार आंदोलनों ने महिलाओं के भीतर अधिकारों की चेतना फूँकी। राजा राममोहन राय और ज्योतिबा फुले जैसे सुधारकों ने पहले सामाजिक धरातल तैयार किया, जिस पर आगे चलकर राजनीतिक भागीदारी की इमारत बनी। 1917 में एनी बेसेंट द्वारा ‘विमेंस इंडियन एसोसिएशन’ की स्थापना ने पहली बार संगठित रूप से महिलाओं के मताधिकार की मांग उठाई। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, विशेषकर महात्मा गांधी के नेतृत्व में, महिलाओं के लिए एक ‘मुक्ति वाहिनी’ सिद्ध हुआ। गांधीजी ने समझा कि महिलाओं की नैतिक शक्ति के बिना ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ना असंभव है, इसलिए उन्होंने शराबबंदी, विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और नमक सत्याग्रह में महिलाओं को अग्रणी भूमिका दी। सरोजिनी नायडू जैसी नेताओं ने न केवल सड़कों पर विरोध किया, बल्कि गोलमेज सम्मेलनों में जाकर भारतीय महिलाओं की राजनीतिक मांगों को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रखा। इस कालखंड ने महिलाओं को ‘प्रजा’ से ‘नागरिक’ बनने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसका परिणाम स्वतंत्रता के बाद मिलने वाले संवैधानिक अधिकारों के रूप में दिखा।

 

3. स्वतंत्रता पश्चात और वर्तमान (संवैधानिक गरिमा से वास्तविक शक्ति तक):

स्वतंत्र भारत के संविधान ने अनुच्छेद 14 और 15 के माध्यम से महिलाओं को पुरुषों के समान राजनीतिक अधिकार दिए, लेकिन व्यावहारिक राजनीति में यह यात्रा धीमी रही। स्वतंत्रता के प्रारंभिक दशकों में महिलाओं की भागीदारी केवल अभिजात्य वर्ग या राजनैतिक परिवारों तक सीमित थी। वास्तविक क्रांति 1992 के 73वें और 74वें संविधान संशोधन के साथ आई, जिसने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण अनिवार्य किया। इससे ग्रामीण भारत में नेतृत्व का एक नया वर्ग उभरा, जिसने ‘प्रधान-पति’ जैसी चुनौतियों के बावजूद धीरे-धीरे प्रशासनिक कौशल सीखा। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, नारी शक्ति वंदन अधिनियम (2023) इस दिशा में अंतिम और सबसे निर्णायक कदम माना जा रहा है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम (संविधान का 128वाँ संशोधन विधेयक, 2023) 19 सितंबर 2023 को भारतीय संसद के विशेष सत्र के दौरान लोकसभा में पेश किया गया था। यह कानून सीधे निर्वाचित लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करता है। विधेयक 20 सितंबर 2023 को लोकसभा द्वारा और 21 सितंबर 2023 को राज्यसभा द्वारा पारित किया गया और 28 सितंबर 2023 को राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई (नारी शक्ति वन्दन अधिनियम, विकिपीडिया)। तथापि, अधिनियम के कार्यान्वयन को जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया था, जिसके कारण यह तुरंत प्रभावी नहीं हो सका। अप्रैल 2026 में, सरकार ने संविधान (131वाँ) संशोधन विधेयक पेश किया, जिसमें लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 850 करने और परिसीमन के बाद महिला आरक्षण लागू करने का प्रस्ताव था। यह विधेयक लोकसभा में विफल रहा। (नारी शक्ति वन्दन अधिनियम, विकिपीडिया) विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार महिला आरक्षण का उपयोग परिसीमन के माध्यम से अपने राजनीतिक लाभ के लिए कर रही है। वास्तव में, देखा जाय तो महिला आरक्षण को लेकर महिलाओं के नाम पर सिर्फ राजनीति की जा रही है। इस राजनीतिक खेल में विभिन्न राजनीतिक दलों की चाल एवं मतमतांतर कुछ भी हो सकतें हैं, लेकिन महिलाओं को मिलने वाला आरक्षण अवश्य संकट एवं अनिश्चय में पड़ गया है।

 

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में महिला संसदीय प्रतिनिधित्व का विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि रवांडा इस क्षेत्र में अग्रणी स्थान रखता है, जहाँ प्रतिनिधि सभा में 63.75% सीटें महिलाओं के पास हैं। वहाँ के संविधान में निर्णय लेने वाले निकायों में महिलाओं के लिए न्यूनतम 30% आरक्षण का प्रावधान किया गया है, साथ ही राजनीतिक दल सक्रिय रूप से महिला उम्मीदवारों को प्रोत्साहित करते हैं। इसी क्रम में नामीबिया ने 2025 में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की, जब पहली बार महिला राष्ट्रपति, महिला उपराष्ट्रपति और महिला संसद अध्यक्ष एक साथ पद पर रहीं। देश की प्रमुख SWAPO द्वारा अपनाई गई ‘ज़ेबरा प्रणाली’ (जिसमें पार्टी सूचियों में पुरुष और महिला उम्मीदवारों का क्रम वैकल्पिक रखा जाता है) ने महिला प्रतिनिधित्व को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसके परिणामस्वरूप मंत्रिमंडल में महिलाओं की भागीदारी 57% से अधिक हो गई है। वहीं दक्षिण अफ्रीका में 2025 के आंकड़ों के अनुसार महिलाओं का संसदीय प्रतिनिधित्व 42.7% है और अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (ANC) अपनी उम्मीदवार सूचियों में 50% महिला प्रतिनिधित्व अनिवार्य करती है (Namibia Stands Out, Daily Trust, 2025)। नॉर्डिक देशों की बात करें तो आइसलैंड 92.6% स्कोर के साथ लगातार 16वें वर्ष शीर्ष स्थान पर बना हुआ है, जबकि फ़िनलैंड, नॉर्वे, यूनाइटेड किंगडम और न्यूज़ीलैंड भी इस सूची में प्रमुख स्थान रखते हैं। इसके विपरीत, नाइजीरिया में महिला प्रतिनिधित्व अत्यंत निम्न है, जहाँ 2025 में राष्ट्रीय विधानसभा की केवल 4.1% सीटें महिलाओं के पास हैं (Namibia Stands Out, Daily Trust, 2025)।

 

दक्षिण एशियाई देशों में संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व एक मिश्रित तस्वीर पेश करता है। जहाँ कुछ देशों ने कोटा प्रणाली के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रगति की है, वहीं कुछ देशों में स्थिति अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन (IPU) और UN Women की 2025-2026 की रिपोर्टों के अनुसार, नेपाल दक्षिण एशिया में अग्रणी है। यहाँ संवैधानिक रूप से 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। बांग्लादेश में वर्तमान में 350 सीटों में से 50 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं। पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में महिलाओं के लिए सीटें (20%) आरक्षित हैं, जिससे यह संख्या बनी हुई है। भूटान ने हाल के वर्षों में लैंगिक समानता की दिशा में सक्रिय कदम उठाए हैं, जिससे संख्या में (15-17%) सुधार हुआ है। श्रीलंका में महिला प्रतिनिधित्व लगभग 5-6% है, जो क्षेत्र में सबसे कम है।   

 

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में काफी पीछे है। इसे हम निम्न तालिका में देख सकते हैं :-

 

तालिका 1: लोकसभा में महिला प्रतिनिधित्व (1951-2024)

लोकसभा

चुनाव वर्ष

कुल सीटें

महिला उम्मीदवारों की संख्या

निर्वाचित महिला सांसद

महिला सांसदों का प्रतिशत (%)

पहली

1951.52

489

उल्लेखित नहीं

22

4.50%

दूसरी

1957

494

45

22

4.45%

तीसरी

1962

494

66

31

6.28%

चौथी

1967

520

67

29

5.58%

पाँचवी

1971

518

86

21

4.05%

छठी

1977

542

70

19

3.51%

सातवीं

1980

542

143

28

5.17%

आठवीं

1984

542

171

43

7.93%

नौवीं

1989

543

198

29

5.34%

दसवीं

1991

543

330

38

7.00%

ग्यारहवीं

1996

543

599

40

7.37%

बारहवीं

1998

543

274

43

7.92%

तेरहवीं

1999

543

284

49

9.02%

चौदहवीं

2004

543

355

45

8.29%

पंद्रहवीं

2009

543

556

59

10.87%

सोलहवीं

2014

543

668

62

11.42%

सत्रवहीं

2019

543

726

78

14.36%

अठारहवीं

2024

543

797

74

13.63%

स्रोतः भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) की सांख्यिकीय रिपोर्ट और पीआईबी (PIB) प्रेस विज्ञप्ति।

 

उपर्युक्त सारिणी के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि भारत में महिला सांसदों की सबसे कम संख्या 1977 (छठी लोकसभा) में रही, जब केवल 19 महिलाएं निर्वाचित हुईं। वहीं, 2019 (17वीं लोकसभा) में अब तक की सर्वाधिक 78 महिला सांसद सदन पहुँचीं। 1957 में जहाँ केवल 45 महिलाओं ने चुनाव लड़ा था, वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 797 हो गई है। यह राजनीति में महिलाओं की बढ़ती आकांक्षा और सक्रियता को दर्शाता है। आंकड़े बताते हैं कि प्रतिनिधित्व में क्रमिक वृद्धि के बजाय उतार-चढ़ाव (जैसे 1984 के बाद 1989 में गिरावट) रहा है। यह दर्शाता है कि बिना आरक्षण के महिलाओं की संख्या में निरंतर वृद्धि सुनिश्चित करना कठिन है। दिलचस्प तथ्य यह है कि अधिकांश चुनावों में महिला उम्मीदवारों की जीत का प्रतिशत पुरुषों की तुलना में बेहतर रहा है, जो उनकी ‘वोजिबिलिटी’ को प्रमाणित करता है।

 

एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में पहली बार महिला मतदाताओं का टर्नआउट (60.92%) पुरुषों (60.21%) से अधिक था। बिहार के 2025 के चुनावों में 2.5 करोड़ महिला मतदाताओं ने 71.6% टर्नआउट के साथ चुनावी मतदान को आकार दिया। यह परिवर्तन दर्शाता है कि महिलाएँ मतदाता के रूप में सशक्त हो रही हैं, किंतु यह शक्ति अभी उम्मीदवार बनने और निर्वाचित होने में परिवर्तित नहीं हुई है।

 

4. प्रमुख चुनौतियाँ:

·       भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के समक्ष अनेक चुनौतियाँ हैं। सर्वप्रथम, पितृसत्तात्मक राजनीतिक संस्कृति और ‘प्रॉक्सी पॉलिटिक्स’ की घटना अत्यंत गंभीर है, जहाँ निर्वाचित महिलाओं को औपचारिक भूमिकाओं तक सीमित कर दिया जाता है जबकि उनके पति वास्तविक सत्ता का प्रयोग करते हैं। महिलाएँ अक्सर अपने पुरुष रिश्तेदारों के लिए स्टैंड-इन के रूप में चुनी जाती हैं। कर्नेगी एंडोमेंट के शोध के अनुसार, भारतीय महिलाएँ चुनावों के बीच की अवधि में राजनीति में पुरुषों की तुलना में काफी कम सक्रिय होती हैं।

·       द्वितीय, राजनीतिक दलों में महिलाओं की स्थिति नाममात्र की है। उन्हें शायद ही पार्टी अध्यक्ष या राष्ट्रीय निकायों में प्रमुख नेतृत्व की भूमिकाएँ दी जाती हैं। प्रमुख पदों के लिए टिकट वितरण में महिलाओं को प्राथमिकता नहीं दी जाती। 2025 के बिहार चुनावों में राजनीतिक दलों ने 2,600 से अधिक उम्मीदवारों में से केवल 258 महिलाओं को मैदान में उतारा। जब महिलाएँ सत्ता में प्रवेश करती हैं, तो उनके अधिकार पर संदेह किया जाता है और उनकी उपलब्धियों को कम करके आंका जाता है।  यह भी देखा गया है कि शीर्ष पर पहुँची अधिकांश महिलाएँ किसी शक्तिशाली राजनीतिक परिवार से जुड़ी रहीं हैं। विद्वान अमर्त्य सेन के अनुसार, यह ‘विशेषाधिकार प्राप्त महिलाओं’ का सशक्तीकरण है, जो सामान्य पृष्ठभूमि की महिलाओं के लिए मार्ग प्रशस्त करने में हमेशा सफल नहीं होता।

·       तृतीय, महिलाओं की गतिशीलता सीमित है। राजनीति के लिए सार्वजनिक रूप से बाहर निकलना, नेटवर्क बनाना और बैठकें आयोजित करना आवश्यक है, लेकिन सामाजिक मानदंड महिलाओं को घरेलू कार्यों और देखभाल की जिम्मेदारियों तक सीमित रखते हैं।

·       चतुर्थ, चुनावी राजनीति में बढ़ते खर्च और असुरक्षा के कारण सामान्य पृष्ठभूमि की महिलाओं का प्रवेश कठिन है।

·       पंचम, प्रतिच्छेदनता की दृष्टि से मुस्लिम महिलाओं की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। आज़ादी के बाद से केवल 18 मुस्लिम महिलाएँ ही लोकसभा तक पहुँच पाई हैं। वहीं अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को जाति और पितृसत्ता के दोहरे बोझ का सामना करना पड़ता है।

 

5. भविष्य की संभावनाएँ और सुझाव:

नारी शक्ति वंदन अधिनियम के कार्यान्वयन में विलंब के बावजूद, यह भारतीय राजनीति में महिलाओं के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है। इसके कार्यान्वयन के लिए आवश्यक है कि जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए और सभी राजनीतिक दलों के बीच राष्ट्रीय सहमति विकसित की जाए। मैकिन्से ग्लोबल इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत लैंगिक समानता को बढ़ाकर अपने सकल घरेलू उत्पाद में $770 बिलियन जोड़ सकता है। नोबेल पुरस्कार विजेता एस्थर डुफ्लो के अनुभवजन्य शोध से पता चलता है कि जब महिलाएँ शासन में भाग लेती हैं, तो आर्थिक प्राथमिकताएँ दीर्घकालिक, समुदाय-आधारित विकास की ओर स्थानांतरित हो जाती हैं। राजस्थान, बिहार और ओडिशा में अध्ययनों से पता चला है कि निर्वाचित महिला नेता स्वच्छता, पानी और स्कूलों में निवेश को प्राथमिकता देती हैं। राजनीतिक दलों में आंतरिक सुधार की अत्यंत आवश्यकता है। अर्जेंटीना और नेपाल की तरह, भारतीय राजनीतिक दलों को भी अपने उम्मीदवारों की सूचियों में महिलाओं के लिए आंतरिक कोटा घोषित करना चाहिए। पंचायतों में 45% प्रतिनिधित्व की सफलता को विधानसभाओं और संसद में दोहराने के लिए एक मजबूत राजनीतिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। ‘सरपंच पति’ संस्कृति को समाप्त करने के लिए कड़े कानूनी प्रावधान बनाए जाने चाहिए। उच्च महिला मतदान टर्नआउट (बिहार में 71.6%, दिल्ली में 60.92%) का लाभ उठाते हुएए पार्टियों को महिला उम्मीदवारों को मैदान में उतारने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

 

6. निष्कर्ष:

भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का इतिहास एक जटिल और विरोधाभासी कथा प्रस्तुत करता है। एक ओर जहाँ वैदिक काल में महिलाएँ समानता का आनंद लेती थीं, वहीं मध्यकाल में उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। औपनिवेशिक काल में महिलाओं की राजनीतिक चेतना जागृत हुई और स्वतंत्रता के बाद संविधान ने उन्हें कानूनी समानता प्रदान की। 73वें और 74वें संशोधनों ने स्थानीय स्तर पर एक ऐतिहासिक सफलता दर्ज कीए किंतु यह सफलता विधानसभाओं और संसद तक नहीं पहुँच पाई। वर्तमान में, 13.8% लोकसभा प्रतिनिधित्व के साथ, भारत विश्व स्तर पर महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण में सबसे पिछड़े देशों में से एक है। वैश्विक तुलना में, रवांडा (63.75%), नामीबिया (44.2%) और दक्षिण अफ्रीका (42.7%) भारत से कहीं बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। नारी शक्ति वंदन अधिनियम महिलाओं के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है, किंतु इसका कार्यान्वयन अनिश्चितकाल के लिए विलंबित है। भारत को आवश्यकता है कि वह स्थानीय स्तर की सफलता को उच्च स्तरों तक विस्तारित करे, राजनीतिक दलों में आंतरिक सुधार लाए और लिंग बजटिंग को मजबूत करे। जब तक महिलाएँ, जो देश की आधी आबादी हैं, निर्णयन प्रक्रियाओं में समान भागीदार नहीं होंगी, तब तक भारतीय लोकतंत्र को वास्तव में समावेशी और प्रतिनिधित्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता।

 

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Received on 07.06.2026      Revised on 02.07.2026

Accepted on 25.07.2026      Published on 17.08.2026

Available online from August 22, 2026

Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2026; 14(3):143-148.

DOI: 10.52711/2454-2687.2026.00025

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